हेमंत विश्व सर्मा हत्यारा है या मुख्यमंत्री?

असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व सर्मा की तस्वीर जिसमें वह बंदूक से मुसलमानों को निशाना लगा रहे हैं, किसी के भी दिमाग को झिंझोड़ देने वाली है। यह किसी मुस्लिम या किसी खास तबके पर नहीं, बल्कि संविधान पर निशाना है। यह देश के उस ऐतिहासिक दस्तावेज को खुली चुनौती है जिसके निर्देशन और निगरानी में देश चलता है। यह निशाना भारतीय लोकतंत्र पर है। जिसको मार देने की साजिश सत्ता और सत्ता के बाहर बैठी तमाम शक्तियां कर रही हैं। और ऊपर से यह काम अगर कोई मुख्यमंत्री करे जिसने अपने शपथ में देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही बगैर राग द्वेष के काम करने की शपथ ली हो तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है। 

आखिर एक राष्ट्र-राज्य के तौर पर किसी देश की पहली जिम्मेदारी और कर्तव्य क्या होता है? यही तो कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी करे। यह नागरिकों और राज्य के बीच पहला समझौता होता है जिसमें राज्य नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की किसी भी कीमत पर गारंटी का भरोसा देता है। इसीलिए जीवन का अधिकार मूलभूत अधिकारों में सबसे पहले आता है। लेकिन यहां रक्षा करने की बात तो दूर एक सूबे का मुखिया उनको गोली से उड़ाने यानि उनकी हत्या करने का ऐलान कर रहा है। यानि अपने बुनियादी कर्तव्य से पीछे हटकर एक हमलावर अपराधी की तरह व्यवहार कर रहा है। और एक तरह से लोगों को हत्या करने के लिए उकसा रहा है। ऐसे में क्या इस शख्स को एक भी मिनट अपनी कुर्सी पर बने रहने दिया जा सकता है?

अगर यह संविधान का खुला उल्लंघन है तो संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाला सुप्रीम कोर्ट क्या कर रहा है? क्या उसे इस मामले का स्वत: संज्ञान नहीं लेना चाहिए? दो दिन हो गए इस तस्वीर को सामने आये लेकिन अभी तक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है। या तो सुप्रीम कोर्ट के जज साहेबान अपना कर्तव्य भूल गए हैं। या फिर सरकार का दबाव इतना बढ़ गया है कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते जिसमें उसके नुकसान की आशंका हो। लेकिन संज्ञान न लेने का मतलब है एक संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ज़रूर अपनी बची खुची साख भी खो देगा।
पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसले सवालों के घेरे में हैं। जिस तरह की यह घटना है उसमें सीधे सुप्रीम कोर्ट को विस्व सर्मा की बर्खास्तगी का फरमान जारी करना चाहिए। और फिर उनके खिलाफ देशद्रोह लेकर अपनी शपथ का खुला उल्लंघन करने की तमाम धाराओं के तहत केस चलाकर इस तरह की सजा दी जानी चाहिए जिससे आइंदा इस तरह के पद पर बैठा शख्स ऐसी कोई हिम्मत न कर सके।

विश्व सर्मा तो हेट स्पीच के मास्टर हैं। उनका कोई भाषण बगैर उसके खत्म ही नहीं होता है। अक्सरहां पूरा का पूरा भाषण ही इस बात पर केंद्रित होता है कि कैसे सूबे में सांप्रदायिक उन्माद पैदा किया जाए। यह गिरावट इस स्तर तक पहुंच गयी है कि गली मोहल्लों में रहने वाले अनपढ़ और अशिक्षित लोग भी उस भाषा में बात करने में शर्मिंदगी महसूस करेंगे जिसमें विस्व सर्मा बात कर रहे होते हैं। 

मुसलमानों को मिया कह कर बुलाना और फिर उनके खिलाफ नफरत और जहर की उल्टी करना यह विस्व शर्मा की फितरत बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने ठीक ही इसको ‘वर्बल डायरिया’ का नाम दिया है। यह कुछ सभ्य भाषा हो गयी और इसको हिंदी में अगर समझाया जाए तो ‘मुंह से टट्टी’ करना कहलाएगा। जो सर्मा आए दिन करते रहते हैं। अब ऐसा व्यक्ति भला सार्वजनिक जीवन में कैसे रह सकता है? इस घटना के पहले इस शख्स ने मुसलमानों को लेकर जो बयान दिया है वह तो पूरी मानवता को ही शर्मिंदा करने वाली है। 

सरकार का काम तो गरीबों को हर तरीके से सुविधा पहुंचाना होता है। न केवल उनके जीवन स्तर को उठाना बल्कि हर तरीके से उनके सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करना होता है। और एक लोक कल्याणकारी राज्य में किसी और से ज्यादा पहली जिम्मेदारी सरकार की उसके प्रति बनती है। लेकिन हेमंत सर्मा असम में उल्टी गंगा बहा रहे हैं। उनकी शरीर और दिमाग में सांप्रदायिकता का जहर इस कदर फैल गया है कि वह गरीब तक को बख्शने के लिए तैयार नहीं हैं। 

उन्होंने अपने एक भाषण में असम के हिंदुओं को संबोधित करते हुए कहा कि अगर कोई मिया रिक्शा वाला हो और उसे पांच रुपये देने हों तो केवल चार रुपये दीजिए। और इस तरह से मुसलमानों की आर्थिक रीढ़ को तोड़ दीजिए। यह अजीब विडंबना है जिस सरकार और उसके मुखिया को गरीबों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए वह उन्हीं के खिलाफ आग उगल रहा है। जिस मुख्यमंत्री को गरीबों के भूखे पेट में अनाज डालने की व्यवस्था करनी चाहिए वह उनकी मेहनत की कमाई को भी हड़प जाने का फरमान जारी कर रहा है।

ऐसे लोग नागरिक तो छोड़ दीजिए एक मनुष्य भी कहलाने लायक नहीं हैं। ऐसे लोगों को इतनी बड़ी कुर्सी पर पहुंचना भारत की पूरी संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। और इतना सब कुछ होने के बाद भी उनको बनाए रखना पूरी व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने की तरफ इशारा करता है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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